Tuesday, July 19, 2011

ढूँदते-ढूँदते.....

             [ समीर लाल जी के लेख ......   स्पेस- एक तलाश!!!!   से प्रेरित होकर....]

ढूँदते-ढूँदते......

पत्थरों का शहर, पत्थरों के है घर,
तंग रस्ते यहाँ, आदमी तंग नज़र,
हम भी पहुंचे कहाँ घूमते-घूमते.

'चौड़े' हम और सकड़ी बड़ी रहगुज़र !   
ठेलती भीड़ है, कुछ इधर-कुछ उधर,
पार लग ही गए कूदते - कूदते.

शोर बाहर  था, सन्नाटा अन्दर मिला,
जब टटोला तो हर सिम्त पत्थर मिला.
बुझ गयी है नज़र घूरते-घूरते.

नक्श पत्थर पे तहरीर कैसे करूं?
[सब कहा जा चुका है तो अब क्या लिखू,] 
कुछ खरोचा तो, नाख़ून हुए है लहू,
थक गया मैं 'जगह'* ढूँदते-ढूँदते.        *[space]

--mansoor ali hashmi 
  
http://aatm-manthan.com


4 comments:

Udan Tashtari said...

चौड़े' हम और सकड़ी बड़ी रहगुज़र

-हा हा!! क्या खूब नजर डाली मंसूर साहब!! :)

दिनेशराय द्विवेदी said...

शानदार!
बात तो दमदार है ही, सदा की तरह
शिल्प भी कमाल का है।

विष्णु बैरागी said...

नहीं ढूँढा किसी को
तो मिल गए तुम
मिल जाता न जाने कौन-कौन
ढूँढते-ढूँढते

आपकी यह रचना जोरदार तो है ही, तीन पंक्तियोंवाली ऐसी रचना उर्दू संसार में यदा-कदा ही देखने को मिली। सचमुच में शिल्‍प कमाल का है।

ZEAL said...

तंग होती जा रही है आज हमारी सोच , जिसमें अपनों के विचारों का भी समावेश नहीं ! अहंकार हमारा पषित होकर हमें गुब्बारे की तरह फुला रहा है ! लेकिन इस फूले हुए गुब्बारे का अस्तित्व है ही कितनी देर का ??